आम जनता का पुलिस पर से उठता विश्वास आखिर कब तक ?

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….प्रदीप कुमार नायक

पुलिस का नाम आते ही मन में दो भाव एक साथ आते हैं। एक तरफ सुरक्षा की उम्मीद, दूसरी तरफ एक अंजान डर। संविधान ने पुलिस को जनता का मित्र और कानून का प्रहरी कहा था। पर आज गली के नुक्कड़ पर, चाय की दुकान पर, बस स्टैंड पर आम आदमी बस यही पूछता है कि ये हमारी सुनवाई करेंगे भी या नहीं?

विश्वास एक दिन में नहीं टूटता। वो रोज की छोटी-छोटी ठोकरों से टूटता है। जब कोई गरीब चोरी या मारपीट की शिकायत लेकर थाने पहुंचता है तो सबसे पहले उससे पूछा जाता है कि किसका आदमी है। FIR के लिए घंटों इंतजार कराया जाता है। फिर कहा जाता है कि आपस में बैठकर मामला सुलझा लो। आदमी कानून मांगने गया था और उसे पंचायत का रास्ता दिखा दिया जाता है।

सबसे ज्यादा चोट तब लगती है जब कानून सबके लिए एक जैसा नहीं दिखता। गरीब का चालान तुरंत कट जाता है। गाड़ी जब्त हो जाती है। और दूसरी तरफ रसूखदार का बेटा नशे में गाड़ी तोड़कर भी “देखते हैं” कहकर निकल जाता है। जब जनता को लगता है कि वर्दी भी बिकती है तो उसके मन से भरोसा उठने लगता है।

पहले थाना मोहल्ले का हिस्सा हुआ करता था। दरोगा जी गली में आते थे, हालचाल पूछते थे। आज थाने और जनता के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई है। शिकायत लेकर जाओ तो लगता है जैसे किसी दूसरे देश में चले गए हों। लाइब्रेरी में भ्रष्टाचार हो, स्कूल में घोटाला हो, जमीन पर कब्जा हो, आदमी जाए तो किसके पास जाए?

पर सच ये भी है कि हर पुलिस वाला गलत नहीं है। आज पुलिस सबसे ज्यादा दबाव में है। राजनीतिक फोन, ट्रांसफर का डर, स्टाफ की कमी और ऊपर से एक गलत वीडियो वायरल होते ही पूरी वर्दी को कटघरे में खड़ा कर देना। एक ईमानदार सिपाही भी सिस्टम के चक्रव्यूह में फंसकर मजबूर हो जाता है। उसकी भी मजबूरियां हैं।फिर सवाल वही खड़ा होता है कि आखिर रास्ता क्या है? विश्वास कैसे वापस आएगा?

विश्वास वापस लाने के लिए सबसे पहले जवाबदेही तय करनी होगी। हर शिकायत की रसीद मिलनी चाहिए। हर थाने में कैमरा लगना चाहिए। “डायल 112” पर कॉल करने वाले को 24 घंटे के अंदर पता चलना चाहिए कि उसकी समस्या का क्या हुआ। जब पुलिस को लगेगा कि कोई देख रहा है तो मनमानी अपने आप रुकेगी।

दूसरा काम है फासला मिटाना। पुलिस को बैरिकेड के पीछे से निकलकर जनता के बीच आना होगा। महीने में एक दिन गांव में चौपाल लगे। स्कूल में जाकर बच्चों से बात हो। पुलिस सिर्फ डंडा लेकर खड़ी न दिखे, मदद के लिए हाथ बढ़ाती भी दिखे,
और सबसे जरूरी है राजनीतिक दखल का खत्म होना। जिस दिन एक सिपाही बिना किसी के फोन के अपना काम कर पाएगा, उसी दिन जनता फिर से थाने के दरवाजे पर भरोसा लेकर खड़ी होगी।

आज भी आधी रात को कोई मुसीबत आती है तो सबसे पहले 100 नंबर ही याद आता है। इसका मतलब ये है कि जनता ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है। पुलिस को भी ये समझना होगा कि वर्दी ताकत का नहीं, जिम्मेदारी का प्रतीक है।

राजनगर की लाइब्रेरी से लेकर पटना के बड़े दफ्तर तक, जब तक हर संस्था में ईमानदारी नहीं आएगी, तब तक पुलिस पर सवाल उठते रहेंगे। क्योंकि पुलिस इसी समाज से आती है। समाज सुधरेगा तो वर्दी भी अपने आप साफ दिखेगी।

आखिर में सवाल फिर वही है। आम जनता का पुलिस पर से उठता विश्वास आखिर कब तक? इसका जवाब किसी फाइल में नहीं है। ये जवाब हमारे और आपके व्यवहार में है। हमें तय करना है कि हमें कानून का राज चाहिए या फिर वही पुराना “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला सिस्टम।

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