सूचना मांगना गुनाह? ग्रामीण कार्य विभाग में RTI कार्यकर्ता को दौड़ाने का खेल

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….प्रदीप कुमार नायक 

बिहार में सुशासन और पारदर्शिता के लाख दावे किये जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। मधुबनी जिले में सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जानकारी मांगने वाले एक कार्यकर्ता को ग्रामीण कार्य विभाग के अधिकारी किस तरह से मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, इसका ताजा उदाहरण सामने आया है।

यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे RTI तंत्र पर सवाल खड़ा करता है।

क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, राजनगर, मधुबनी निवासी RTI कार्यकर्ता प्रदीप कुमार नायक ने ग्रामीण कार्य विभाग, कार्य प्रमंडल, मधुबनी से राजनगर प्रखंड में वर्ष 2025-26 में हुई सड़क निर्माण योजनाओं से संबंधित जानकारी मांगी थी। खर्च, कार्य एजेंसी और गुणवत्ता रिपोर्ट जैसे बुनियादी सवाल पूछे गए थे।

RTI अधिनियम की धारा 7(1) के अनुसार 30 दिनों में सूचना देना अनिवार्य है, लेकिन विभाग ने समय पर जवाब नहीं दिया। मजबूर होकर कार्यकर्ता ने अधीक्षण अभियंता-सह- प्रथम अपीलीय प्राधिकार के समक्ष धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील दायर की।

26 की सुनवाई, PIO नदारद और 24 को फोन का खेल
प्रथम अपीलीय प्राधिकार, कार्य अंचल, मधुबनी द्वारा पत्रांक 620 और 621 दिनांक 26/10/2026 के माध्यम से दिनांक 26.10.2026 को सुनवाई निर्धारित की गई। अगली तिथि 31.10.2026 निर्धारित कर दी गई।

कार्यकर्ता का आरोप है कि 26 तारीख की सुनवाई से ठीक दो दिन पहले, यानी 24 अक्टूबर को उसी कार्यालय से फोन आया और उन्हें कार्यालय बुलाया गया। जब वे 24 को कार्यालय पहुंचे तो मौखिक रूप से कहा गया – “आप अपना आवेदन दूसरे विभाग में दे दीजिए।”

सवाल यह है कि जब मामला प्रथम अपील में पहुंच चुका है, तो दूसरा विभाग कहां से आ गया? और यदि सूचना दूसरे विभाग से संबंधित थी भी, तो RTI की धारा 6(3) के तहत 5 दिनों के भीतर आवेदन को संबंधित लोक प्राधिकार को हस्तांतरित कर आवेदक को सूचित करना था, न कि महीनो बाद फोन पर टाल-मटोल करना।

कानून क्या कहता है?
कानूनी जानकारों के अनुसार यह पूरी कार्रवाई RTI अधिनियम का खुला उल्लंघन है।
1. धारा 7(1): 30 दिन में सूचना देना बाध्यकारी।
2. धारा 6(3): यदि सूचना अन्य विभाग से संबंधित है तो 5 दिन में ट्रांसफर करना होगा।
3. धारा 19(1): प्रथम अपील का 30-45 दिन में निस्तारण।
4. धारा 20: सूचना न देने वाले PIO पर 250 रुपये प्रतिदिन, अधिकतम 25,000 रुपये तक जुर्माना और विभागीय कार्रवाई का प्रावधान।

कार्यालय से फोन कर बुलाना और मौखिक निर्देश देना, बिना किसी लिखित आदेश के, यह न केवल गैर-कानूनी है बल्कि आवेदक को परेशान करने की श्रेणी में आता है।

कार्यकर्ता ने क्या कहा?
इस संबंध में RTI कार्यकर्ता ने कहा, “मैंने तो सिर्फ सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता मांगी थी। लेकिन मुझे ही बार-बार कार्यालय बुलाकर परेशान किया जा रहा है। पहले 26 को बुलाया, फिर 24 को फोन कर दूसरे विभाग में जाने को कहा। मैं प्रथम अपील कर चुका हूं, अब मैं सीधे बिहार राज्य सूचना आयोग में जाऊंगा। ये लोग बार-बार परेशान करते हैं।”

बड़ा सवाल
यह घटना बताती है कि क्यों आम लोग RTI लगाने से कतराते हैं। जब एक जागरूक कार्यकर्ता को ही इस तरह दौड़ाया जा रहा है, तो आम ग्रामीण की क्या स्थिति होगी?

अब कार्यकर्ता ने तय किया है कि वह 31 अक्टूबर की सुनवाई में न जाकर, 45 दिन की अवधि पूरी होने पर सीधे बिहार राज्य सूचना आयोग, पटना में चारों RTI के लिए द्वितीय अपील दायर करेगा।

ग्रामीण कार्य विभाग के इस रवैये पर अधीक्षण अभियंता को जवाब देना होगा कि 24 अक्टूबर को फोन कर बुलाने का लिखित आधार क्या था और 26 अक्टूबर की सुनवाई में PIO ने मौखिक न आने को कहाँ l फिर 31 अक्टूबर को आने का पत्र व्हाटशाप्प पर क्यों ?

निष्कर्ष: सूचना का अधिकार नागरिकों को दिया गया एक शक्तिशाली हथियार है, लेकिन यदि इसे लागू करने वाले अधिकारी ही इसे मजाक बना दें, तो लोकतंत्र की पारदर्शिता पर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा। अब निगाहें राज्य सूचना आयोग पर टिकी हैं।

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